पांच देवियां हैं जो संपूर्ण प्रकृति की संचालन करती हैं

नारदजी श्रीनारायण से पुछते हे प्रभु मूलप्रकृति का स्वरूप क्या है उनका लक्षण क्या हैं और वे किस प्रकार प्रगट हुई। श्रीनारायण कहते हैं - हे वत्स महामाया युक्त परमेश्वर सृष्टि के निमित्त अर्धनारीश्वर बन गये, जिनका दक्षिणार्थ भाग पुरुष और वामार्ध भाग प्रकृति कहा जाता हैं। जैसे अग्नि में दाहिका शक्ति अभिन्न रूप से स्थित हैं, वैसे ही परमात्मा और प्रकृतिरूपा शक्ति भी अभिन्न हैं। इसीलिए योगिजन स्त्री और पुरुष का भेद नहीं करते वे निरंतर चिन्तन करते है की सभी कुछ ब्रह्मा है। भगवती मूलप्रकृति सृष्टि करने की कामना से भक्तों पर अनुग्रह करने हेतु पांच रूपों में अवतरित हुई गणेशमाता दुर्गा शिवप्रिया तथा शिवरूपा है। जो पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा हैं। शुद्ध सत्वरूपा महालक्ष्मी अधिष्ठात्री तथा आजीविका स्वरूपिणी हैं, वे वैकुंठ में अपने स्वामी श्री विष्णु की सेवा में तत्पर रहती हैं। वे स्वर्ग मे स्वर्गलक्ष्मी, राजाओं में राज्यलक्ष्मी, गृहस्थ मनुष्यों के घर में गृहलक्ष्मी और सभी प्राणियों में तथा पदार्थो में शोभारूप में विराजमान रहती हैं। भगवती सरस्वती परमात्मा की वाणी, बुद्धि, व...