देवी षष्ठी ने राजा के मृत बालक को पुनर्जीवित कर दिया
षष्ठी मैया ने राजा के मृत बालक को पुनर्जीवित कर दिया

प्राचीन समय की बात हैं राजा स्वायंभुव मनु का प्रियव्रत नामक एक पुत्र था
योगीराज होने के कारण प्रियव्रत विवाह नहीं करना चाहते थे
तपस्या में उनकी विशेष रुचि थी
ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रियव्रत को मालनी नामक राजकुमारी के साथ विवाह के लिए विवश होना पड़ा विवाह के बाद अनेक वर्षों बाद भी उन्हें कोई संतान प्राप्त नहीं हुई।
ऋषि कश्यप ने उनसे पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। कश्यप मुनि रानी मालनी को यज्ञ का प्रसाद प्रदान किया ।
प्रसाद ग्रहण करने के बाद रानी गर्भवती हो गई रानी मालनी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया
लेकिन वह बालक मृत अवस्था में पैदा हुआ मृत बालक को देखकर सारे राज्य में शोक छा गया
पुत्र वियोग में मालनी बेहोश हो गई।
राजा प्रियव्रत उस मृत बालक को लेकर श्मशान गए
श्मशान में वह दुखी होकर मां जगदम्बा का स्मरण करने लगे
तभी वहां एक दिव्य विमान प्रगट हुआ।
वह विमान देवी षष्ठी का था राजा ने देवी षष्ठी को प्रणाम किया
देवी षष्ठी राजा से बोली मैं ब्रह्माजी मानस कन्या देवसेना हूं।
भगवान कार्तिकेय मेरे पति हैं भगवती के छठे अंश से प्रगट होने के कारण जगत में मै षष्ठी नाम से प्रसिद्द हूं
मेरे प्रसाद से पुत्रहीन व्यक्ति को सुयोग्य पुत्र और कर्मशील व्यक्ति को उसके कर्मों के उत्तम फल प्राप्त होते हैं।
माता षष्ठी की बात सुनकर राजा ने विभिन्न प्रकार से देवी की स्तुति की और देवी षष्ठी से पुत्र प्रदान करने की पार्थना की देवी ने कहा हे राजन तुम मेरी पूजा करवाओ और स्वयं भी नियमित मेरा ध्यान करो मैं तुम्हे एक उत्तम पुत्र प्रदान करूंगी। जगत में वह सुव्रत नाम से प्रसिद्द होगा। सभी गुणों से युक्त वह बालक भगवान नारायण का अंशावतार और योगी पुरुष होगा। तीनों लोकों में उसकी कीर्ति होगी।
देवी षष्ठी ने राजा के मृत बालक को उठा लिया और अपनी शक्ति से उसे पुनर्जीवित कर दिया।
राजा खुशी खुशी अपने पुत्र को साथ लेकर घर लौट आए पुत्र के जीवित होने की खुशी में राजा ने सर्वत्र मांगलिक कार्य आरंभ करा दिए उनके राज्य में देवी षष्ठी की नियमित पूजा आराधना होने लगी। तब से प्रत्येक महीने शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के अवसर पर माता षष्ठी का महोत्सव श्रद्धा और भक्तिपूर्वक मनाया जाने लगा।
बालकों को जन्म लेते ही छठे दिन, इक्कीसवे दिन और ( शिशु को पहली बार खीर चटाने का उत्सव) शुभ अवसर पर देवी षष्ठी की पूजा होने लगीं ।
जो भी संतानहीन स्त्री देवी षष्ठी के स्त्रोत का एक वर्ष तक श्रवण करती हैं, वह देवी षष्ठी की कृपा से पुत्रवती हो जाती हैं
धार्मिक कथाओं के अनुसार षष्ठी देवी जिसे हम छठी मैया कहते है छठ पूजा में भगवान सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा हम सब करते हैं देवी षष्ठी की सवारी बिल्ली हैं
माता षष्ठीं बच्चों की दाता और रक्षक है बच्चे के जन्म देने के दौरान उनकी सहायता करती है
जिसकी पूजा बच्चों के दाता और रक्षक के रूप में की जाती माँ षष्ठी वनस्पतियों की भी देवी है
जय मां षष्ठी
ReplyDeleteअत्यंत उत्तम एवं प्रभावपूर्ण प्रस्तुति 🙏
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